Gautam Buddha or buddhism in hindi | गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म | Inspirational story

Gautam Buddha or buddhism हिंदी में Inspirational story

Gautam Buddha-यह गाथा है भारत के सबसे महान, सबसे ओजस्वी युग परिवर्तन की। जिसने इतिहास की धारा का रुख मोड़ दिया। यह गाथा है, कभी महलों के भोग विलास में रहे कुमार सिद्धार्थ की। राजकुमार सिद्धार्थ के गौतम बुद्ध बन जाने की और यह कहानी है, भारतवर्ष के गौरवशाली अतीत की, जिसने पूरे विश्व को जीवन दर्शन का उपदेश दिया। जीवन का वास्तविक उद्देश्य बताया। इसी गौरवशाली भारत के इतिहास के पन्नों से लेकर, आज के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग की यह अविरल धारा, आज भी करोड़ों लोगों के जीवन के उद्देश्य को समझने के लिए प्रेरित करती है।

 

एक राजकुमार, जिसके जन्म लेने पर ज्योतिष यह भविष्यवाणी करते हैं कि वह बालक एक दिन बुद्ध बनेगा। एक राजकुमार जो पैदा होने से पहले ही, अपनी माता के सपने में सफेद हाथी के रूप में आया था। एक राजकुमार जो महलों की शान और शौकत के बीच बड़ा हुआ। अनेकों अप्सराओं और सुख सुविधा के बीच रहने वाला राजकुमार, जिसने एक दरिद्र व्यक्ति, एक वृद्ध को देखकर इस ब्रह्मांड के रहस्य को जानने की एक इच्छा जताई।

जिसने उसके भीतर एक प्रश्न जगाया कि, जब यह जीवन ही मिथ्या है, तो हम अपने जीवन को भोग विलास में क्यों व्यर्थ करते हैं और यहां से शुरू हुई, उस राजकुमार के बुद्ध बनने की कहानी।

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वह समय था, आज से 2500 साल पहले, जब भारत वर्ष में वैदिक सभ्यता का प्रचलन था, पर समय की गति के साथ उसमें आडंबर बढ़ते गए। ब्राह्मण समाज ज्ञान और शिक्षा में अपने कुल को सबसे महान समझने लगा था। उसके अनुसार, जीवन मुक्ति के लिए दो ही मार्ग हो सकते थे, या तो खाना पीना सब छोड़कर व्यक्ति कठोर तप करें और जीवन से संन्यास ग्रहण कर ले, या फिर कर्मकांड के मार्ग से, जीवन से मुक्ति पाकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान करें। जिसे हम सीधी भाषा में अतिरेगो का समय कह सकते हैं यानी हर व्यवस्था का एक चरम सीमा पर थी ।

लेकिन समय से आगे बढ़कर, समाज के विरुद्ध जाकर, बुद्ध ने मध्यम मार्ग का रास्ता बताया। जिस प्रकार, किसी वीणा के तारों को जोर से खींचने पर, वह टूट जाते हैं और अगर ढीला छोड़ दे, तो गीत के स्वर नहीं निकाल पाते। मधुर संगीत केवल तभी निकल पाता है, जब तार की कसावट कहीं बीच में हो, ना की बहुत ढीली हो, ना ही बहुत कसा हुआ। इसी प्रकार जीवन के लिए भी उन्होंने मध्यम मार्ग की बात कहीं। आज भी बिहार के गया में, स्थित पीपल के पेड़ के नीचे, जिसे आज संसार बोधी वृक्ष के नाम से जानता है, इसी पेड़ के नीचे, सिद्धार्थ गौतम नाम का, यह राजकुमार बुद्ध बना।

बुद्ध अर्थात जागृत,जिसे ज्ञान की प्राप्ति हो गई हो। बुद्ध को इसी पीपल के पेड़ के नीचे सुबोधी प्राप्त हुई। यहां से बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई। अब बुद्ध धर्म एक तरंग है, उपाधि है, जिसका अर्थ है, जो जाग रहा है। यानी की एक ऐसा व्यक्ति जो वास्तविकता के प्रति जागृत है। जो जीवन और मृत्यु के इस चक्र को जानता है, और उसकी मोह में नहीं पड़ता। जिसे सांसारिक माया के बंधनों से मुक्ति मिल गई हो, वह बुद्ध है। मान्यताओं के अनुसार, गौतम बुद्ध यानी सिद्धार्थ का जन्म आज से ढाई हजार साल पहले, हिमालय की गोद में बसे, प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण, नेपाल में हुआ था।

वह स्थान भारतीय नेपाल सीमा पर, एक छोटे से राज्य के रूप में बसा हुआ था। बुद्ध के जन्म के दिन को, बौद्ध देशों में वैशाख दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनके पिता राजा शुद्धोदन, गौतम के एक महान राजा होने की कामना करते हुए, अपने पुत्र को धार्मिक शिक्षा और मानवीय पीड़ा के ज्ञान से बचाते थे, पर भाग्य का लिखा कौन बदल सकता है।

जीवन के शुरुआती 29 वर्ष, महलों के भोग विलास में बिताने के बाद, एक दिन वह भ्रमण के लिए निकले। राजा शुद्धोदन आदेश जारी किया कि कोई भी गरीब, वृद्ध या सन्यासी उस मार्ग पर ना आए। जिसमें राजकुमार सिद्धार्थ जाने वाले थे, पर वही हुआ, जो होना था। सिद्धार्थ ने एक वृद्ध व्यक्ति को देखा, सन्यासी देखा और उसे शारीरिक रूप में अपने से अलग पाया। जिससे उनके मन में यह प्रश्न जागृत हुआ कि आखिर जब वह भी एक दिन वृद्ध और शरीर से निर्बल हो जाएंगे, तो क्यों ना वह इस जीवन के वास्तविक उद्देश्य को खोजें।

यानी कि जब एक दिन सभी को वृद्ध और निर्बल हो जाना है, तो उन्हें जीवन के उद्देश्य की खोज करनी चाहिए, और सत्य को जानने का प्रयास करना चाहिए, और फिर 29 वर्ष की आयु में, गौतम ने घर छोड़ दिया। तपस्या और अनुशासन की जीवन शैली को अपनाया। लगातार 49 दिनों के ध्यान के बाद, गौतम ने बिहार के, बौद्ध गया गांव में, एक पीपल के पेड़ के नीचे, बोधी प्राप्त की। जिस वृक्ष को बोधि वृक्ष के नाम से जाना जाता है। इसके बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश, देश के बनारस शहर के पास, सारनाथ गांव में दिया था।

इस घटना को धर्म चक्र प्रवर्तन के रूप में जाना जाता है। बुद्ध जीवन भर मध्यम मार्ग के संदेश को लोगों को देते रहे, और उनके व्याख्यानों में, बड़ी भीड़ जुटी रहती थी, और अंततः 80 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी देह का त्याग कर दिया। यह समय 483 ईसा पूर्व का था, और उनका देहांत उत्तर प्रदेश के कुशीनगर नामक स्थान में हुआ था। इस घटना को महापरि निर्वाण के नाम से जाना जाता है।

आज पूरे विश्व का चौथा सबसे बड़ा धर्म, बौद्ध धर्म है। जिसके 52 करोड़ से अधिक अनुयाई है। यह सभी गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के अनुसार अपना जीवन बिताते हैं। बुद्ध के सभी अनुयाई जीवन के चार सत्यों के आधार पर दुख से मुक्ति प्राप्त करने को ही जीवन का उद्देश्य मानते हैं। जिससे अंत में उनको निर्वाण की प्राप्ति हो। यह कहानी सुनाने में तो अच्छी लगती है, पर जब बात आती है, इनको जीवन में धारण करने की. तब यह उतनी ही कठिन और असामान्य लगने लगती है। समाज से हटकर अकेले रहना, किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता और फिर समाज की धारा को मोड़ देना, मानो कई युगों में एक बार होता है।

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