मारुति नंदन की कहानी | maruti nandan story | Inspirational story | Motivational

maruti nandan/मारुति नंदन श्री हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार है। यानि भगवान शिव ने हीं हनुमान जी का रूप लेकर अवतार लिया था। इसके पीछे भी एक कारण था। जो जुड़ा था- भगवान विष्णु को मिले एक श्राप से।

मारुति नंदन का जन्म | maruti nandan ka janam

एक बार की बात है परम विष्णु भक्त, नारद मुनि ने हजारों वर्षों तक तपस्या की। उनकी तपस्या देखकर इंद्रदेव हमेशा की तरह घबरा गए और उन्होंने कामदेव को बुलाकर कहा- कामदेव तुम जाकर नारद मुनि की तपस्या भंग कर दो। कहीं ऐसा ना हो तपस्या के बल से, नारद मुनि वह देवलोक का सिंहासन प्राप्त कर ले।

जो आज्ञा इंद्रदेव, कामदेव, नारद मुनि की तपस्या भंग करने चल दिए। उन्होंने सारे तरीके आजमा लिए। लेकिन वह नारद मुनि का ध्यान भंग ना कर सके, और खाली हाथ लौट आए। तपस्या पूरी होने पर, नारद मुनि को इस बात का बहुत घमंड हो गया कि उन्होंने कामदेव को हरा दिया। अब वह चाहते थे कि यह बात भगवान विष्णु और शिव जी को भी पता चले कि वह कितने तक बड़े तपस्वी है। बस वह पहुंच गए, भगवान विष्णु के सामने, प्रणाम प्रभु कैसे हैं।

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नारद मुनि आपकी तपस्या कैसी रही? मेरी तपस्या पूरी हुई प्रभु। इंद्रदेव की हालत खराब हो गई, मेरी तपस्या से। यहां तक की कामदेव भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाए। तभी वहां भगवान शिव भी आ गए। यह तो बहुत खुशी की बात है, मुनिवर वाकई आपके जैसा तपस्वी संसार में कोई दूसरा नहीं। खुद ही अपनी तारीफें कर नारद मुनि वहां से चले गए। महादेव, भगवान विष्णु को चिंता में देखकर समझ गए थे कि नारद मुनि अहंकार में फंस चुके हैं और विष्णु जी इस बात से परेशान है।

 

महादेव ने उनसे पूछा क्या सोच रहे हैं प्रभु? यही कि नारद मुनि कामदेव से तो बच गया, मगर अहंकार में फस गया है। उसको सही रास्ते पर लाना पड़ेगा। बात तो आप सही कह रहे हैं। नारद मुनि आपके परम भक्त है और भक्त की रक्षा तो करनी ही पड़ेगी। महादेव की बात सुनकर, भगवान विष्णु मंद मंद मुस्कुराने लगे। उन्होंने अपनी योग माया से एक मायावी नगरी का निर्माण किया। जो देखने में बेहद सुंदर बेहद भव्य थी और यह उसी रास्ते में बनाई गई थी। जहां से नारद मुनि रोज गुजरा करते थे ।

नारद जी ने जब उस नगरी को पहली बार देखा तो घोर आश्चर्य में पड़ गए। कितना सुंदर नगर है। कमाल है, मैं यहां से कितनी बार गुजरा हूं। लेकिन पहले कभी नजर क्यों नहीं आया। नारद जी नगर में जाकर घूमने लगे। उस समय वहां की राजकुमारी विश्व मोहिनी के स्वयंवर की तैयारी चल रही थी। जो किसी अप्सरा से भी ज्यादा सुंदर और आकर्षक थी। नारद मुनि राजकुमारी को देखकर उस पर मोहित हो गए।

उन्होंने राजकुमारी की कुंडली भी देखी जिसमें लिखा था, जो उस राजकुमारी से विवाह करेगा। वह अजय और अमर हो जाएगा। कुंडली देखकर नारद मुनि सोचने लगे, अगर मेरा विवाह राजकुमारी से हो जाए तो, कहां वह रूप सी, और मैं साधारण ब्राह्मण। मुझे वह क्यों पसंद करेगी। अगर मुझे भी भगवान विष्णु जैसा रूप मिल जाए तो शायद बात बन जाए। नारद मुनि अपनी इच्छा लेकर भगवान विष्णु के पास गए- हे प्रभु! आप मुझे विश्व मोहिनी के स्वयंवर में हिस्सा लेने के लिए अपने जैसा सुंदर और आकर्षक बना दीजिए। ताकि वह अपने स्वयंवर में मेरा ही चुनाव करें।

विष्णु जी मन ही मन हंस पड़े और सोचने लगे मेरी माया ने अपना काम कर ही दिया। नारद मुनि को फंसा ही लिया। वे नारद मुनि से बोले- मैं अपने भक्तों की हमेशा मदद करता हूं। तुम्हारी भी करूंगा। विष्णु जी ने नारद मुनि का शरीर तो अपने जैसा बना दिया। लेकिन चेहरा एक बंदर का बना दिया। नारद मुनि अपने हाथ पर वस्त्र आभूषण देखकर खुश हो रहे थे। लेकिन वह अपना चेहरा वह देख नहीं पाए थे। इसीलिए वह राजकुमारी के स्वयंवर में खुशी-खुशी चले गए। वहां सब उनको देखकर हंस रहे थे। मगर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है।

विश्व मोहिनी भी वरमाला लिए, उनके सामने से गुजरी तो, उन पर हंसी और आगे बढ़ गई।  तभी वहां भगवान विष्णु भी आ गए। राजकुमारी ने जैसे ही उन्हें देखा उनके गले में वरमाला डाल दी। यह देख  नारद मुनि गुस्से से भर गए और वह भगवान से बोले- प्रभु आप जानते थे कि मैं विश्व मोहिनी से विवाह करना चाहता हूं। फिर आप यहां क्यों आए? आप यहां ना आते तो, राजकुमारी मेरे गले में ही वरमाला डालती। नारद मुनि की बात सुनकर वहां खड़े आसपास के प्रतियोगी हंसने लगे और कहने लगे, अपना चेहरा देखा है दर्पण में ? बंदर जैसे चेहरे वाले के साथ राजकुमारी स्वयंवर करेगी।अरे तुमने सोचा भी कैसे?

तभी नारद मुनि ने पास रखें, पानी के बर्तन में, अपनी छवि देखी और अपना बंदर जैसा चेहरा देखकर आश्चर्य से भर गए। उन्होंने भगवान विष्णु पर एक नजर डाली। भगवान विष्णु मुस्कुरा रहे थे। उस पर नारद मुनि ने खुद को बेहद अपमानित महसूस किया।उस समय वह भूल गए  कि उनके सामने कोई और नहीं उनके आराध्य भगवान विष्णु है।  जिनका वह हर समय नाम जपते हैं। क्रोध में उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे डाला।

यह आपने अच्छा नहीं किया प्रभु। अपने जैसे मुझसे मेरा प्रेम छीना है, वैसे हीं आप भी अपने प्रेम के लिए तड़पेंगे। आपने मेरा चेहरा बंदर का बना कर हंसी उड़ाई। देखना एक दिन ऐसा आएगा,जब यह बंदर ही आपके काम आएगा। नारद मुनि को गुस्से से लाल हुआ देख, विष्णु भगवान ने अपनी माया समेट ली। अब वहां ना कोई नगरी थी और ना ही राजकुमारी। वैसा ही सुनसान रास्ता था। जैसा कि पहले हुआ करता था। यह देखकर नारद जी आश्चर्यचकित रह गए कि यह सब क्या है। प्रभु आपने मेरे साथ यह खेल क्यों रचा।

अपने भोले भक्त को, उसके अहंकार और क्रोध के दर्शन कराने के लिए। वह भक्त समझता था कि वह सच्चा भक्त है। उसकी भक्ति में बड़ा बल है। मगर आज उसे पता चला कि कैसे छोटी सी बात से दुखी होकर उसने अपने ही भगवान को श्राप दे डाला। नारद मुनि! सच्चे भक्त कभी अपना गुणगान नहीं करते। वह सिर्फ ईश्वर की कृपा का गुणगान करते हैं। नारद मुनि को समझ आ गया था कि भगवान शिव और भगवान विष्णु ने मिलकर उनको यह सीख देने के लिए लीला रची थी।

श्राप की बात याद कर, उन्हें बहुत दुख हुआ। वह विष्णु भगवान से रो-रो कर माफी मांगने लगे। भक्तों का श्राप तो भगवान को लेना ही पड़ता है। मगर आप चिंता ना करें, इससे भी संसार का कुछ भला ही होगा। तब भगवान शिव बोले- नारद मुनि ने अपने श्राप में जिस बंदर का जिक्र किया है। वह मैं बनूंगा। प्रभु आपकी उस लीला में, मैं आपकी हर समय सेवा में तत्पर्य रहूंगा।

त्रेता युग में जब विष्णु भगवान ने श्री राम के रूप में जन्म लिया, तो उन्हें नारद मुनि के श्राप के कारण, सीता के लिए तड़पना पड़ा। तब उनकी सहायता के लिए महादेव ने, हनुमान जी के रूप में अवतार लिया। नारद मुनि की बात का मान रखने के लिए उन्होंने वानर जाति में  कपिराज केसरी के घर जन्म लिया।

हे गुरुदेव मुझे यह बताएं हनुमान जी और श्री राम जी के जन्म में क्या संबंध है?

अयोध्या के महाराज, राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी। संतान की चाह में उनके कुल गुरु ऋषि वशिष्ठ ने एक यज्ञ करने को कहा। महाराजा दशरथ ने ऐसा ही किया। यज्ञ की समाप्ति के बाद, यज्ञ की अग्नि से प्रसाद के रूप में खीर प्रकट हुई। उस खीर को गुरु वशिष्ठ ने राजा की तीनों रानी कौशल्या, सुमित्रा और कैकई में बांट दिया। कौशल्या तथा रानी कैकई ने तो अपना-अपना भाग खा लिया। किंतु जैसे ही सुमित्रा ने अपने हिस्से का प्रसाद उठाया, तभी आकाश से एक गरुड़ पक्षी आया। प्रसाद का एक हिस्सा अपनी चोच में दबाकर उड़ गया।

ठीक उसी समय पहाड़ी पर वानर राज केसरी की पत्नी अंजना संतान पाने के लिए तपस्या कर रही थी। वह प्रसाद गरुड़ से छूकर उनकी गोद में आ गिरा। अंजना को लगा, यह उनकी तपस्या का फल है। इसीलिए उन्होंने उसे खा लिया। इसीलिए जब उनके यहां हनुमान जी का जन्म हुआ, तो हनुमान जी के मन में श्री राम के प्रति सहज ही प्रेम था और श्री राम भी  हनुमान जी को अपने भाइयों  के समान ही प्यारे थे।

हे गुरुदेव! एक बात बताइए, हनुमान जी जब वानर राज केसरी के पुत्र थे तो उन्हें पवन पुत्र क्यों कहा जाता है?

दरअसल हनुमान जी का जन्म पवन देव के आशीर्वाद से हुआ था। वह एक तरह से हनुमान जी के आध्यात्मिक पिता थे। इसीलिए हनुमान जी हवा की तरह तेज उड़ सकते थे और बलशाली है। इसके पीछे भी एक कारण है, केसरी राज और अंजना को कोई संतान नहीं थी तो उन्होंने मतंग मुनि के पास जाकर पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने बताया कि पवन देव को तपस्या से प्रसन्न करो। वह तुम्हारी इच्छा पूर्ण करेंगे।

अंजना देवी ने पूर्ण श्रद्धा से और विश्वास के साथ तप किया। तब पवन देव ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और आशीर्वाद दिया। मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूं। मेरा ही रूप तुम्हारे पुत्र के रूप में पैदा होगा। जो मेरे सामान बलशाली और तेज होगा। इसीलिए संसार हनुमान जी को केसरी नंदन, अंजनी कुमार के साथ पवन पुत्र के नाम से भी जानती है।

हे गुरुदेव! यह बताएं हनुमान जी अपने बचपन में कैसे थे? क्या वह भी हम बच्चों की तरह शरारत किया करते थे या बचपन से ही ध्यान और भक्ति में  डूबे हुए थे?

सुनकर गुरुदेव मुस्कुराए! हनुमान जी देखने में बहुत सुंदर और भोले थे। उनके चेहरे पर सूर्य जैसा तेज और आंखों में चंचलता थी। उनके बाल छोटे और घुंघराले थे।वह कानों में छोटे-छोटे कुंडल पहने करते थे। देखने में भले ही सीधे लगते थे। मगर उनमें बहुत ज्यादा ऊर्जा थी। इसीलिए वह आम बच्चों से बहुत ज्यादा शरारती थे।

हनुमान जी को, पवन देव ने ,अपने ही समान शक्तियां दी हुई थी। यानी वे हवा की गति से कहीं भी जा सकते थे। अपना शरीर बड़ा छोटा या हल्का कर सकते थे। लेकिन हनुमान जी थे तो बच्चे ही। ना उन्हें अपनी शक्तियों का अंदाजा था और ना ही इतनी समझ थी कि उन्हें कब और कैसे प्रयोग करना चाहिए।इसी कारण एक बार बड़ी समस्या हो गई थी। हुआ यू की बाल हनुमान को बड़ी भूख लग रही थी। माता अंजनी आसपास नहीं थी। तभी उनकी नजर उगते सूरज पर पड़ी। जो किसी लाल फल सा नजर आ रहा था। उसे देखकर वह सोचने लगे-

अरे यह कितना सुंदर फल टंगा है! आसपास  माता तो कहीं दिख नहीं रही, जब तक वह मुझे भोजन दे, तब तक मैं इसे ही खा लेता हूं। ऐसा सोचकर हनुमान जी ने सूरज की और हाथ बढ़ाया। सूरज उनकी पकड़ में नहीं आया। अपने आप तेजी से सूरज की ओर बढ़ने लगा ।जैसे-जैसे पास जाने पर सूरज बड़ा होने लगा। वैसे-वैसे बालक हनुमान का शरीर भी बड़ा होता जा रहा था। बाल हनुमान जल्दी ही सूरज तक पहुंच गए और उन्होंने सूरज को अपने मुंह में रख लिया।

ऐसा होते ही पूरे संसार में अंधेरा हो गया। सूरज के चारों ओर घूमने वाले ग्रहों की गति रुक गई। यह देख देवताओं में खलबली मच गई। इंद्रदेव तुरंत ऐरावत पर सवार होकर वज्र हाथ में लेकर देखने चले कि ऐसा क्यों हुआ है। वहां पर उन्होंने बाल हनुमान को देखा- तुम कौन हो?  तुम्हारी सूर्य देव को निगलने की हिम्मत कैसे हुई? जानते भी हो, इसका परिणाम क्या होगा ?चलो जल्दी से उनको मुक्त करो।

यह फल मैंने लिया है। अब यह मेरा है। मैं इसे खाऊंगा। यह कोई फल नहीं है, सूर्य देव है। जिनकी ऊर्जा और प्रकाश से सारा संसार चल रहा है। इंद्रदेव बहुत समझाने की कोशिश कर रहे थे। मगर हनुमान जी तो बच्चे ही थे। उन्हें इन सब बातों की कहां समझ थी। आखिर में इंद्रदेव को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपने वज्र से हनुमान जी पर प्रहार कर दिया। जिससे वह बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर गए।

जब यह बात पवन देव को पता चली तो वह बुरी तरह क्रोधित हो गए।  क्रोध में आकर पवन देव ने अपनी गति रोक ली। पशु, पक्षी, वनस्पतियों सभी का दम घुटने लगा। पृथ्वी पर हाहाकार मच गया। सभी देवताओं को चिंता होने लगी ।इंद्रदेव जल्दी ही कुछ कीजिए। पवन देव का क्रोध शांत कीजिए, वरना पृथ्वी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इंद्रदेव सभी देवताओं को साथ लेकर पवन देव को मनाने चल दिए।

शांत हो जाइए पवन देव। बालक हनुमान जल्दी ही पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा। आप चिंता ना करें। बाकी देवता भी बोले हां-हां पवन देव, हम सभी देवता बालक हनुमान को अपनी-अपनी शक्तियां देंगे। वह संसार का सबसे शक्तिशाली बालक होगा। इसके बाद हनुमान जी को सभी देवताओं से वरदान मिलने लगे।

मैं सूर्य देव- बाल हनुमान को अपनी तेज का सौवा भाग देता हूं। यह मेरे ही समान तेजस्वी होगा ताकि भविष्य में मैं इसे खुद ही शिक्षा दूंगा।

मैं न्याय का देवता यमराज- मैं बाल हनुमान को वरदान देता हूं कि वह हमेशा स्वस्थ और निरोगी रहेगा। इसका कोई भी वध नहीं कर पाएगा।

मैं देवराज इंद्र- बाल हनुमान को वरदान देता हूं कि यह बालक संसार में सबसे ज्यादा शक्तिशाली होगा। मेरे वज्र का भी इस पर कोई असर नहीं होगा।

मैं जल देवता- बाल हनुमान को वरदान देता हूं कि जल कभी हनुमान को डुबो नहीं पाएगा।

मैं कुबेर- बाल हनुमान को अपनी परम शक्ति वाली गदा देता हूं। जिसके बल पर कोई भी इस युद्ध में हरा नहीं पाएगा।

मैं विश्वकर्मा -बाल हनुमान को वरदान देता हूं कि मेरे बनाए हुए जितने भी अस्त्र-शस्त्र है वह सब हनुमान में बेअसर रहेंगे। वह सदैव हर युद्ध जीतेगा।

मैं ब्रह्मदेव-बाल हनुमान को वरदान देता हूं कि इसकी भक्ति भी प्रभावित होगी और शक्ति भी। यह इच्छा और जरूरत के अनुसार रूप, रंग और आकार बदल सकता होगा। जहां चाहेगा, वहां बहुत तेजी से पहुंच जाएगा।  इस पर ब्रह्मास्त्र का भी कोई असर नहीं होगा। इस तरह सभी देवताओं ने हनुमान को कोई ना कोई वरदान दिया। जिससे पवन देव का क्रोध शांत हुआ।

मगर इस घटना के कारण, एक और बात हुई हनुमान जी बहुत कम उम्र में ही बहुत शक्तिशाली हो गए। जबकि अभी उन्हें शक्तियों को संभालना नहीं आता था। कई बार उनकी शक्तियों की वजह से, छोटी-छोटी शरारते भी बहुत बड़ी हो जाती थी और दूसरों के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती थी। जैसे कभी छोटा सा रूप लेकर जंगल में जाकर छिप जाते थे। कभी बड़ा बन कर लोगों को डरा देते थे।

खास कर उन्हें, ध्यान में आंखें बंद करके बैठे, ऋषि मुनियों को तंग करने में उन्हें बड़ा मजा आता था।  किसी को ऊपर हवा में उठा देते। किसी को पेड़ पर बैठा देते। कभी उनकी वस्तुएं गायब कर देते। इसी कारण, एक बार एक ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया कि तुम अपनी सारी शक्तियों को भूल जाओ। ताकि फिर किसी को ना सता ना सको। यह खबर जब केसरी राज और माता अंजनी को पता चली तो ,वह ऋषि के पास जाकर ,उनसे माफी मांगने लगे। हे ऋषि वर! बालक मारुति से जो कुछ हुआ है, वह अनजाने में हुआ है।

उसके लिए उसे इतना कठोर दंड न दें। ठीक है माता, मैं श्राप वापस तो नहीं ले सकता। मगर उसका असर जरूर कम कर सकता हूं। यह बालक वैसे तो अपनी शक्तियों को भूला रहेगा, लेकिन जब इसे शक्तियों की जरूरत होगी, किसी के याद दिलाने पर,  इसे उनकी याद आएगी और वह अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकेगा। साथ ही हमेशा, इसमें इतनी सद्बुद्धि रहेगी, कि अपनी शक्तियों का कभी भी गलत उपयोग नहीं करेगा। इसके बाद बाल हनुमान  ने फिर कभी किसी को तंग नहीं किया।

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