जाने शबरी को मोक्ष कैसे प्राप्त हुआ? Shabri ko moksh

Shabri -शबरी एक आदिवासी भील पुत्री थी। देखने में अत्यंत साधारण और मन की बहुत सुंदर थी। इनके पिता ने इनका विवाह निश्चित किया। लेकिन आदिवासियों की एक प्रथा थी कि किसी भी अच्छे कार्य से पहले वह निर्दोष जानवरों की बलि देते थे।
इस प्रथा के लिए शबरी के पिता इनके विवाह से एक दिन पहले 100 भेड़ बकरियां लेकर आये। तब शबरी ने पिताजी से पूछा पिताजी इतनी सारी भेड़ बकरियां क्यों लाये हो?

पिता ने कहा शबरी यह एक प्रथा है जिसके अनुसार कल प्रातः तुम्हारी विवाह विधि शुरू करने से पहले इन सभी भेड़ बकरियों की बलि दी जायेगी। यह कह कर उनके पिता वहां से चले जाते हैं। प्रथा के बारे में सुनकर शबरी बहुत दुखी होती है और वह पूरी रात उन भेड़ बकरियों के पास ही बैठी रहती है।

उसके मन में एक ही विचार था कि कैसे वो इन निर्दोष जानवरों को बचा पाये। तब एका एक शबरी के मन में एक खयाल आता है कि अगर वो सुबह होने से पहले अपने घर से भाग कर जंगल चली जाये तो इन निर्दोष जानवरों की जान बच सकती है। शबरी भली भांति जानती थी कि अगर वो इस तरह एक बार घर से जायेगी तो कभी भी उसे घर वापस आने का मौका नहीं मिलेगा।

फिर भी शबरी ने खुद से पहले उन निर्दोष जानवरों की सोची। घर से निकल कर शबरी एक घने जंगल में जा पहुंची। अकेली शबरी जंगल में भटक रही थी। तब उसने शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से कई गुरू वरों के आश्रम में दस्तक दी। लेकिन शबरी एक तुच्छ जाति की थी इसलिये उसे सभी ने दुत्कार कर निकाल दिया। शबरी भटकती हुई मतंग ऋषि के आश्रम पहुंची और उसने शिक्षा प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की।

मतंग ऋषि ने शबरी को अपने गुरुकुल में स्थान दे दिया। अन्य सभी ऋषियों ने मतंग ऋषि का तिरस्कार किया। शबरी ने गुरुकुल के सभी आचरणों को आसानी से अपना लिया और दिन रात अपने गुरु की सेवा में लग गयी। शबरी जतन से शिक्षा ग्रहण करने के साथ साथ आश्रम की सफाई, गौशाला की देखरेख, दूध दुहना जैसे कार्य सभी गुरुकुल वासियों के लिए भोजन बनाने के कार्य में भी लग गई।

कई वर्ष बीत गए मतंग ऋषि शबरी की गुरू भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए। मतंग ऋषि का शरीर अब दुर्बल हो चुका था इसलिए उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा, पुत्री, मेरा अब दुर्बल हो चुका है, इसलिए मैं अपना देह यहीं छोड़ना चाहता हूँ। लेकिन उससे पहले मैं तुम्हें आशीर्वाद देना चाहता हूँ। बोलो पुत्री, तुम्हें क्या चाहिए? आँखों में आँसू भर कर शबरी मतंग ऋषि से कहती है, हे गुरुवर! आप ही मेरे पिता हैं। मैं आपकी कारण ही अभी तक जीवित हूँ। आप मुझे अपने साथ ले चलें।

तब मतंग ऋषि ने कहा, नहीं पुत्री, मेरे बाद तुम्हें इस आश्रम का ध्यान रखना है। तुम जैसी गुरू परायण शिष्या को उसके कर्मों का उचित फल मिलेगा। एक दिन भगवान राम तुमसे यहाँ मिलने आयेंगे और उस दिन तुम्हारा उद्धार होगा और तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। इतना कह कर मतंग ऋषि अपनी देह त्याग देते हैं। उसी दिन से शबरी हर रोज उठकर बाग जाती, ढेर सारे फल इकट्ठा करती, सुंदर फूलों से आश्रम सजाती क्यूंकि उसे भगवान राम के आने का कोई निश्चित दिन नहीं पता था। उसे केवल अपने गुरुवर की बात पर यकीन था इसलिये वो रोज श्रीराम के इन्तजार में समय बिता रही थी।

एक दिन शबरी आश्रम के पास के तालाब में जल लेने गयी वहीं पास में एक ऋषि तपस्या में लीन थे। जब उन्होने शबरी को जल लेते देखा तो उसे अछूत कह कर उस पर एक पत्थर फेंककर मारा और उसकी चोट से बहते रक्त की एक बूँद से ही सारे तालाब का पानी रक्त में बदल गया। यह देखकर वह संत। को बुरा भला कह कर पापी पापी कह कर चिल्लाने लगी। शबरी रोती हुई अपनी आश्रम में चली गई और उसके जाने के बाद ऋषि फिर से तप करने लगे।

उन्होंने बहुत से जतन किये। उस में गंगा यमुना सभी पवित्र नदियों का जल डाला गया लेकिन वो रक्त जल में नहीं बदला। कई वर्षों बाद जब भगवान राम सीता की खोज में वहां आये तब वहां के लोगों ने भगवान राम को बुलाया और आग्रह किया कि वे अपने चरणों के स्पर्श से इस रक्त को पुनः जल में बदल दें। राम उनकी बात सुन कर तालाब के रक्त को चरणों से स्पर्श करते हैं लेकिन कुछ नहीं होता। तब श्रीराम ऋषि से पूछते हैं हे ऋषि! पर मुझे इस तालाब का इतिहास बताएं।

तब ऋषि उन्हें शबरी और तालाब की पूरी कथा बताते हैं और कहते हैं हे भगवान! यह उसी शूद्र शबरी के कारण अपवित्र हो गया है। तब भगवान राम दुखी होकर कहते हैं हे गुरूवर! यह रक्त उस देवी शबरी का नहीं मेरे हृदय का है जिसे तुमने मेरे शब्दों से घायल किया है। भगवान राम ऋषि से आग्रह करते हैं कि मुझे देवी शबरी से मिलना है तभी शबरी को बुलावा भेजा जाता है। राम का नाम सुनते ही शबरी दौड़ी चली आती है। राम मेरे प्रभु कहती हुई जब वो तालाब के पास पहुँचती है तब उसके पैरों की धूल उस तालाब में चली जाती है और तालाब का सारा रक्त फिर से जल में बदल जाता है।

तब भगवान राम कहते हैं देखिये गुरुवर आपकी कहने पर मैंने सब किया लेकिन यह रक्त भक्त शबरी के पैरों की धूल से ही जल में बदल गया। शबरी जैसे ही भगवान राम को देखती है उनके चरणों को पकड़ लेती है और अपने साथ अपने आश्रम में लाती है। उस दिन भी शबरी रोज की तरह अपना आश्रम फूलों से सजाती है और बाग से चख चख कर सबसे मीठे बेर अपने प्रभु श्री राम के लिए चुनती है। वह पूरे उत्साह के साथ अपने प्रभु राम का स्वागत करती है और बड़े प्रेम से उन्हें अपने जूठे बेर परोसती है।

भगवान राम भी बड़े प्रेम से उसे खाने के लिए उठते हैं। तब उनके साथ कई लक्ष्मण उन्हें रोक कर कहते हैं भ्राता ये पीर छूटे हैं। तब राम कहती है लक्ष्मण ये पीठ जूते नहीं सब से मीठे हैं क्यूंकि इनमें प्रेम है और प्रभु श्रीराम बहुत ही प्रेम से उन बेरों को खाते हैं। मतंग ऋषि का कथन सत्य होता है और देवी शबरी को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस तरह भगवान राम शबरी के राम कहलाए।

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