श्रीमद्भगवद्गीता श्री कृष्ण अनमोल वचन | 50+ Srimad Bhagavad Gita Shri Krishna inspired Words in hindi

श्रीमद्भगवद्गीता श्री कृष्ण अनमोल वचन

1-ऐसा कोई नहीं, जिसने भी इस संसार में अच्छा कर्म किया हो और उसका बुरा अंत हुआ है, चाहे इस काल(दुनिया) में हो या आने वाले काल में।

विवरण: कहा जाया है “कर्म ही धर्म है” इसलिए हमें कर्म करते जाना चाहिए फल अपने आप हमें मिलेगा। इस दुनिया में जितने भी लोग सफल हुए हैं सब लोग अपने कर्म के लिए ही हुए हैं। उन्होंने बिना कुछ सोचे समझे लोगों की नकारात्मक बातों को अपने से दूर रख कर अपने कार्यों को पूर्ण किया और आखरी में उन्हें सफलता प्राप्त हुई।

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हे  अर्जुन !, मैं  भूत, वर्तमान  और  भविष्य  के  सभी  प्राणियों  को  जानता  हूँ, किन्तु  वास्तविकता  में  कोई  मुझे  नहीं  जानता.

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2-जो भी मनुष्य अपने जीवन अध्यात्मिक ज्ञान के चरणों के लिए दृढ़ संकल्पों में स्थिर है, वह सामान रूप से संकटों के आक्रमण को सहन कर सकते हैं, और निश्चित रूप से यह व्यक्ति खुशियाँ और मुक्ति पाने का पात्र है।

विवरण: अगर आप अपने लक्ष्य को पाने के लिए दृढ़ सकल्प ले लेते हैं और दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं तो आपके रास्ते में जितने भी संकट/मुश्किलें आयें, आप उनको पार कर जायेंगे।

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3-जो खुशियाँ बहुत लम्बे समय के परिश्रम और सिखने से मिलती है, जो दुख से अंत दिलाता है, जो पहले विष के सामान होता है, परन्तु बाद में अमृत के जैसा होता है – इस तरह की खुशियाँ मन की शांति से जागृत होतीं हैं।

विवरण: जब कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य पर सफलता प्राप्त कर लेता है, तो उसके जीवन के सभी दुख अपने आप ख़त्म हो जाते हैं, जीवन में नया उमंग और खुशियाँ भर जाती हैं।

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श्रीमद्भगवद्गीता श्री कृष्ण अनमोल वचन
श्रीमद्भगवद्गीता श्री कृष्ण अनमोल वचन

 

4-भगवान या परमात्मा की शांति उनके साथ होती है जिसके मन और आत्मा में एकता/सामंजस्य हो, जो इच्छा और क्रोध से मुक्त हो, जो अपने स्वयं/खुद के आत्मा को सही मायने में जानते हों।

विवरण: सही मायने में जो मनुष्य क्रोध से मुक्त होता है, और जिसके मन में एक जूट होने की इच्छा होती है, वह सच्चा होता है, भगवान हमेंशा उसके साथ होते हैं।

6-किसी दुसरे के जीवन के साथ पूर्ण रूप से जीने से बेहतर है की हम अपने स्वयं के भाग्य के अनुसार अपूर्ण जियें।

विवरण: हमें अपने  जीवन में मेहनत करना चाहिए दूसरों के जीवन की उन्नति और सफलता को भूला कर अपने जीवन से नकारात्मक विचारों को दूर कर अपने भाग्य को उज्जवल बनाना चाहिए।

7-एक उपहार तभी पवित्र है जब वह हृदय से किसी सही व्यक्ति को सही समय और सही जगह पर दिया जाये, और जब उपहार देने वाला व्यक्ति दिल में उस उपहार के बदले कुछ पाने की उम्मीद ना रखता हो।

विवरण: हमें इस जीवन में जो भी करना चाहिए सोच समझ कर करना चाहिए, और सही समय पर करना चाहिए। हमें समय और दुसरे लोगों दोनों को सम्मान देना चाहिए और दिल खोल कर उनका मदद करना चाहिए।

8-अपने कर्म पर अपना दिल लगायें, ना की उसके फल पर।

विवरण: इसके विषय में हमने पहले भी बताया जीवन में कर्म करके फल की आशा से जीवन में असफलता प्राप्त होती है ना की सफलता।

श्रीमद्भगवद्गीता श्री कृष्ण अनमोल वचन

9-सभी काम धयान से करो, करुणा द्वारा निर्देशित किये हुए।

विवरण: दिल में दया की भावना रखना चाहिए, इससे मनुष्य का दरजा बढ़ता है।

10-हर व्यक्ति का विश्वास उसकी प्रकृति के अनुसार होता है.

विवरण: जीवन से स्वार्थ को भूल कर त्याग भावना को लाना चाहिए।

11-अपने कर्त्तव्य का पालन करना जो की प्रकृति द्वारा निर्धारित किया हुआ हो, वह कोई पाप नहीं है।

विवरण: अपनी सही जिम्मदारियों को करने में कोई झिजक नहीं होना चाहिए।

12-आपको कर्म करने का अधिकार है, परन्तु फल पाने का नहीं। आपको इनाम या फल पाने के लिए किसी भी क्रिया में भाग नहीं लेना चाहिए, और ना ही आपको निष्क्रियता के लिए लम्बे समय तक करना चाहिए। इस दुनिया में कार्य करें, अर्जुन, एक ऐसे आदमी जिन्होंने अपने आपको स्वयं सफल बनाया, बिना किसी स्वार्थ के और चाहे सफलता हो या हार हमेशा एक जैसे।

विवरण: अगर हम फल की आशा में कार्य करेंगे तो ना हमारे कार्य सफल हो पाएंगे और ना ही हम अपने लक्ष्य तक पहुँच पाएंगे।

13-सन्निहित आत्मा के अनंत का अस्तित्व है, अविनाशी और अनंत है, केवल भौतिक शरीर तथ्यात्मक रूप से खराब है, इसलिए हे अर्जुन लड़ते रहो।

विवरण: हमारे अंतर मन की शक्ति और सोच ही असली है, बहार का शरीर मात्र एक काल्पनिक रूप है जो हमाको इस दुनिया में एक ढांचा देता है।

14-गर्मी और सर्दी, खुशी और दर्द की भावनाएं, उनकी वस्तुओं के साथ होश से संपर्क के कारण होता है। वे आते हैं और चले जाते हैं, लम्बे समय तक बरक़रार नहीं रहते हैं। आपको उन्हें स्वीकार करना चाहिए।

विवरण: पिथ्वी में जिस प्रकार मौसम में परिवर्तन आता है उसी प्रकार जीवन में भी सुख-दुख आता जाता रहता है।

15-मैं आत्मा हूँ, जो सभी प्राणियों के हृदय/दिल से बंधा हुआ हूँ। मैं साथ ही शुरुवात हूँ, मध्य हूँ और समाप्त भी हूँ सभी प्राणियों का।

विवरण: भगवन कहते हैं वो सबके दिल में हैं, और हर समय सभी लोगों के साथ हूँ।

16-सभी वेदों में से मैं साम वेद हूँ, सभी देवों में से मैं इंद्र हूँ, सभी समझ और भावनाओं में से मैं मन हूँ, सभी जीवित प्राणियों में मैं चेतना हूँ।

विवरण: श्री कृष्णा प्रभु जी कहते हैं वे मनुष्य हो या देव गण सभी जगह मौजूद हैं।

17-हम जो देखते/निहारते हैं वो हम है, और हम जो हैं हम उसी वस्तु को निहारते हैं। इसलिए जीवन में हमेशा अच्छी और सकारात्मक चीजों को देखें और सोचें।

विवरण: हमें हमेशा सकारात्मक चीजों को देखना चाहिए और सकारात्मक सोच रखना चाहिए क्योंकि यह हमारे अस्तित्व को लोगों के सामने व्यक्त करता है।

18-वह मैं हूँ, जो सभी प्राणियों के दिल/ह्रदय में उनके नियंत्रण के रूप में बैठा हूँ; और वह मैं हूँ, स्मृति का स्रोत, ज्ञान और युक्तिबाद संबंधी. दोबारा, मैं ही अकेला वेदों को जानने का रास्ता हूँ, मैं ही हूँ जो वेदों का मूल रूप हूँ और वेदों का ज्ञाता हूँ।

19- स्वर्ग  प्राप्त  करने  और  वहां  कई  वर्षों  तक  वास  करने  के  पश्चात  एक  असफल  योगी  का  पुन:   एक  पवित्र  और  समृद्ध  कुटुंब  में  जन्म  होता  है.

20-वह  जो  इस  ज्ञान  में  विश्वास  नहीं  रखते, मुझे  प्राप्त  किये  बिना   जन्म  और  मृत्यु  के  चक्र  का  अनुगमन  करते  हैं.

21-बुद्धिमान व्यक्ति को समाज कल्याण के लिए बिना आसक्ति के काम करना चाहिए.

22-जो  व्यक्ति  आध्यात्मिक  जागरूकता  के  शिखर  तक  पहुँच  चुके  हैं  , उनका  मार्ग  है  निःस्वार्थ  कर्म  . जो  भगवान्  के  साथ  संयोजित हो  चुके  हैं  उनका  मार्ग  है  स्थिरता  और  शांति.

23-आपका अपने कर्म पर नियंत्रण है, परन्तु किसी परिणाम पर दावा करने का नियंत्रण नहीं। असफलता के डर से, किसी कार्य के फल से भावनात्मक रूप से जुड़े रहना, सफलता के लिए सबसे बड़ी बाधा है, क्योंकि यह लगातार कार्यकुशलता को परेशान कर के धैर्य को लूटता है।

24-केवल मन  ही  किसी  का  मित्र  और  शत्रु  होता  है.

25-मैं  सभी  प्राणियों  के  ह्रदय  में  विद्यमान  हूँ.

26-वह  जो  मृत्यु  के  समय  मुझे  स्मरण  करते  हुए  अपना  शरीर  त्यागता  है, वह  मेरे  धाम   को प्राप्त  होता  है. इसमें  कोई  शंशय  नहीं है.

27-हजारों लोगों में से, कोई एक ही पूर्ण रूप से कोशिश/प्रयास कर सकता है, और वो जो पूर्णता पाने में सफल हो जाता है, मुश्किल से ही उनमे से कोई एक सच्चे मन से मुझे जनता हैं।

28-स्वार्थ से भरा हुआ कार्य इस दुनिया को कैद में रख देगा। अपने जीवन से स्वार्थ को दूर रखें, बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के।

 

29-यद्द्यापी  मैं  इस  तंत्र  का  रचयिता  हूँ, लेकिन  सभी  को  यह  ज्ञात  होना  चाहिए  कि  मैं  कुछ  नहीं  करता  और  मैं  अनंत  हूँ.

30-वह  जो  सभी  इच्छाएं  त्याग  देता  है  और  “मैं ”  और  “मेरा ” की  लालसा  और भावना  से  मुक्त  हो  जाता  है  उसे  शांती  प्राप्त  होती  है.

31-मेरे  लिए  ना  कोई  घृणित   है  ना  प्रिय.किन्तु  जो  व्यक्ति  भक्ति  के  साथ  मेरी  पूजा  करते  हैं  , वो  मेरे  साथ  हैं  और  मैं  भी  उनके  साथ  हूँ.

32-मैं  ऊष्मा  देता  हूँ, मैं  वर्षा करता हूँ  और  रोकता  भी हूँ, मैं  अमरत्व   भी  हूँ  और  मृत्यु  भी.

33-बुरे  कर्म  करने  वाले, सबसे  नीच व्यक्ति जो  राक्षसी  प्रवित्तियों  से  जुड़े  हुए  हैं, और  जिनकी  बुद्धि  माया  ने  हर  ली  है  वो  मेरी  पूजा  या  मुझे  पाने  का  प्रयास  नहीं  करते.

34-जो कार्य में निष्क्रियता और निष्क्रियता में कार्य देखता है वह एक बुद्धिमान व्यक्ति है.

35-मैं धरती की मधुर सुगंध हूँ. मैं अग्नि की ऊष्मा हूँ, सभी जीवित प्राणियों का जीवन और सन्यासियों का आत्मसंयम हूँ.

36-भले ही सबसे बड़ा पापी दिल से मेरी पूजा/तपस्या करे, वह अपने सही इच्छा की वजह से सही होता है। वह जल्द ही शुद्ध हो जाते हैं और चिरस्तायी/अनंत शांति प्राप्त करते हैं। इन शब्दों में मेरी प्रतिज्ञा है, जो मुझे प्रेम/प्यार करते हैं, वह कभी नष्ट नहीं होते।

37-मैं समय हूँ, सबका नाशक, मैं आया हूँ दुनिया को उपभोग करने के किये।

38-तुम उसके लिए शोक करते हो जो शोक करने के योग्य नहीं हैं, और फिर भी ज्ञान की बाते करते हो.बुद्धिमान व्यक्ति ना जीवित और ना ही मृत व्यक्ति के लिए शोक करते हैं.

39-कभी ऐसा समय नहीं था जब मैं, तुम,या ये राजा-महाराजा अस्तित्व में नहीं थे, ना ही भविष्य में कभी ऐसा होगा कि हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाये.

40-कर्म मुझे बांधता नहीं, क्योंकि मुझे कर्म के प्रतिफल की कोई इच्छा नहीं.

41-हे अर्जुन ! हम दोनों ने कई जन्म लिए हैं. मुझे याद हैं, लेकिन तुम्हे नहीं.

42-वह जो वास्तविकता में मेरे उत्कृष्ट जन्म और गतिविधियों को समझता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनः जन्म नहीं लेता और मेरे धाम को प्राप्त होता है.

43-अपने परम भक्तों, जो हमेशा मेरा स्मरण या एक-चित्त मन से मेरा पूजन करते हैं, मैं व्यक्तिगत रूप से  उनके कल्याण का उत्तरदायित्व  लेता हूँ.

44-क्योंकि भौतिकवादी श्री कृष्ण के अध्यात्मिक बातों को समझ नहीं सकते हैं, उन्हें यह सलाह दी जाती है कि वे शारीरिक बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित करें और देखने की कोशिश करें की कैसे श्री कृष्ण अपने शारीरिक अभ्यावेदन से प्रकट होते हैं।

45-वासना, क्रोध और लालच नरक के तीन दरवाजे हैं।

46-कर्म योग वास्तव में एक परम रहस्य है.

47-कर्म उसे नहीं बांधता जिसने काम का त्याग कर दिया है.

48-क्रोध से पूरा भ्रम पैदा होता है, और भ्रम से चेतना में घबराहट।  अगर चेतना ही घबराया हुआ है, तो बुद्धि तो घटेगी ही, और जब बुद्धि में कमी आएगी तो एक के बाद एक गहरे खाई में जीवन डूबती नज़र आएगी। जीवन मैं कभी भी घुस्सा/क्रोध ना करें यह आपके जीवन के ध्वंस कर देगा।

49-सभी अच्छे काम छोड़ कर बस भगवान में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाओ. मैं तुम्हे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा. शोक मत करो.

50-क्रोध से पूरा भ्रम पैदा होता है, और भ्रम से चेतना में घबराहट।  अगर चेतना ही घबराया हुआ है, तो बुद्धि तो घटेगी ही, और जब बुद्धि में कमी आएगी तो एक के बाद एक गहरे खाई में जीवन डूबती नज़र आएगी।

51-किसी और का काम पूर्णता से करने से कहीं अच्छा है कि अपना काम करें, भले ही उसे अपूर्णता से करना पड़े.

52-मैं उन्हें ज्ञान देता हूँ जो सदा मुझसे जुड़े रहते हैं और जो मुझसे प्रेम करते हैं.

53-वह जो अपने भीतर अपने स्वयं से खुश रहता है, जिसके मनुष्य जीवन एक आत्मज्ञान है, और जो अपने खुद से संतुष्ट हैं, पूरी तरीके से तृप्त है – उसके लिए जीवन में कोई कर्म नहीं हैं।

54-अपनी इच्छा शक्ति के माध्यम से अपने आपको नयी आकृति प्रदान करें। कभी भी स्वयं को अपन आत्म इच्छा से अपमानित न करें। इच्छा एक मात्र मित्र/दोस्त होता है स्वयं का, और इच्छा ही एक मात्र शत्रु है स्वयं का।

55-मैं सभी प्राणियों को सामान रूप से देखता हूँ; ना कोई मुझे कम प्रिय है ना अधिक. लेकिन जो मेरी प्रेमपूर्वक आराधना करते हैं वो मेरे भीतर रहते हैं और मैं उनके जीवन में आता हूँ.

56-प्रबुद्ध व्यक्ति सिवाय ईश्वर के किसी और पर निर्भर नहीं करता.

57-हे अर्जुन, केवल भाग्यशाली योद्धा ही ऐसा युद्ध लड़ने का अवसर पाते हैं जो स्वर्ग के द्वार के सामान है.

58-भगवान प्रत्येक वस्तु में है और सबके ऊपर भी.

59-बुद्धिमान व्यक्ति कामुक सुख में आनंद नहीं लेता.

60-व्यक्ति जो चाहे बन सकता है यदि वह विश्वास के साथ इच्छित वस्तु  पर लगातार चिंतन करे.

61-उससे मत डरो जो वास्तविक नहीं है, ना कभी था ना कभी होगा.जो वास्तविक है, वो हमेशा था और उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता.

62-मनुष्य को अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए।जैसे – विद्यार्थी का धर्म विद्या प्राप्त करना, सैनिक का धर्म देश की रक्षा करना आदि। जिस मानव का जो कर्तव्य है उसे वह कर्तव्य पूर्ण करना चाहिए।

63-एक ज्ञानवान व्यक्ति कभी भी कामुक सुख में आनंद नहीं लेता।

64-अगर ज्ञान के बाद घमंड का जन्म होता हैं, तो वह ज्ञान जहर हैं। अगर ज्ञान के बाद नम्रता का जन्म होता हैं तो वह ज्ञान अमृत हैं।

65-अच्छाई और बुराई इंसान के कर्मों में होती है ,कोई बांस का तीर बनाकर किसी को घायल करता हैं तो कोई बांसुरी बजाकर बांस को सुख से भरता हैं ।

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